Rishikesh Highway Project : 4600 पेड़ों की बलि क्यों?- डॉ. वी.के. बहुगुणा

Bahuguna V K Dr DG
Dr. VK Bahuguna, former IFS

Rishikesh Highway Project जंगलों की कटाई और पेड़ों का संरक्षण। एक पेड़ को तैयार होने में लगभग 50–60 वर्ष लग जाते हैं, लेकिन उसे काटने में केवल एक मिनट लगता है। इन दिनों ऋषिकेश के जंगलों में हजारों पेड़ काटे जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि राष्ट्रीय राजमार्ग को सीधा करने के लिए यह कटाई की जा रही है। इसको लेकर ऋषिकेश और देहरादून क्षेत्र में बड़ा आंदोलन चल रहा है।

आज हमारे साथ इस विषय पर चर्चा करने के लिए उपस्थित हैं डॉ. वी.के. बहुगुणा। आप भारतीय वन सेवा के पूर्व अधिकारी रहे हैं, आईसीएफआरई के महानिदेशक रहे हैं, विश्वविद्यालय के कुलपति रहे हैं तथा त्रिपुरा सरकार में प्रधान सचिव के रूप में भी कार्य कर चुके हैं। जंगलों, वन्यजीव संरक्षण और प्रशासन का आपका लंबा अनुभव रहा है। विशेष रूप से संयुक्त वन प्रबंधन (Joint Forest Management) पर आपने काफी कार्य किया है।

प्रश्न 1:

ऋषिकेश में इस मुद्दे को लेकर लोग आंदोलन कर रहे हैं। विशेष रूप से पर्यावरणविद् आलोक नौटियाल ने लोगों को संगठित किया है। आप स्वयं भी देहरादून में रहते हैं। आपका क्या मानना है? क्या ऋषिकेश के जंगल काटे जाने चाहिए, या फिर कोई ऐसा समाधान निकाला जाना चाहिए जिससे सड़क भी बन जाए और जंगल भी सुरक्षित रहें?

उत्तर (डॉ. वी.के. बहुगुणा):

देखिए, यह विषय दो अलग-अलग मामलों से जुड़ा हुआ है।

पहला मामला भानियावाला से ऋषिकेश तक राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) द्वारा बनाए जा रहे फोरलेन सड़क परियोजना का है, जिसको लेकर आंदोलन चल रहा है। मेरी सोशल डेवलपमेंट फाउंडेशन के अध्यक्ष श्री अनूप नौटियाल, जो एक प्रतिष्ठित पर्यावरणविद् हैं, लंबे समय से इस मुद्दे को उठा रहे हैं।

दूसरा मामला ऋषिकेश के पुराने वन क्षेत्रों में बसे लोगों से जुड़ा है। इस संबंध में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि जहाँ वन भूमि पर अतिक्रमण हुआ है, उसे हटाया जाए। इसी मामले में अनीता कंडवाल द्वारा एक रिट याचिका दायर की गई। उस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि वहाँ फलदार पेड़ लगाए जाएँ और वन क्षेत्र का संरक्षण किया जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे मामले का स्वतः संज्ञान (Suo Motu) भी लिया है। उत्तराखंड में जिस प्रकार वन भूमि पर अतिक्रमण हो रहा है, भूमि माफिया कब्ज़ा कर रहे हैं और वन भूमि का क्षरण हो रहा है, उस पर सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को कड़ी टिप्पणी करते हुए आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।

अब यदि हम भानियावाला–ऋषिकेश सड़क परियोजना की बात करें, तो मेरा स्पष्ट मत है कि विकास होना चाहिए। मैं स्वयं उत्तराखंड में इंस्पेक्टर जनरल ऑफ फॉरेस्ट रहा हूँ। मेरे कार्यकाल में लगभग 85 रुकी हुई सड़क परियोजनाओं को आवश्यक वन स्वीकृतियाँ दिलाई गई थीं, क्योंकि विकास भी आवश्यक है।

जहाँ वास्तव में पेड़ काटना अनिवार्य हो, वहाँ अनुमति दी जा सकती है, लेकिन बिना समुचित योजना के बड़े पैमाने पर पेड़ काटना उचित नहीं है।

इस परियोजना में लगभग 4600 पेड़ काटे जाने की बात कही जा रही है। ऐसे में सबसे पहला प्रश्न यह उठता है कि क्या वास्तव में इतने पेड़ काटना आवश्यक है?

दूसरा प्रश्न यह है कि क्या सड़क का अलाइनमेंट थोड़ा बदला नहीं जा सकता था ताकि कम पेड़ काटने पड़ते?

तीसरा प्रश्न यह है कि क्या पूरे मार्ग को फोरलेन बनाना अनिवार्य था, या केवल उन स्थानों पर चौड़ीकरण किया जा सकता था जहाँ सड़क अत्यधिक घुमावदार और दुर्घटनाजन्य है?

मैं स्वयं अक्सर उस मार्ग से अपने गाँव जाता हूँ। रानीपोखरी के आगे केवल कुछ सीमित स्थान ऐसे हैं जहाँ खतरनाक मोड़ हैं। यदि उन्हीं स्थानों पर आवश्यक सुधार कर दिए जाते, तो अधिकांश पेड़ों को बचाया जा सकता था।

यह पूरा क्षेत्र केवल हाथियों का कॉरिडोर (Elephant Corridor) ही नहीं है, बल्कि अत्यंत महत्वपूर्ण पारिस्थितिक आवास (Ecological Habitat) भी है। इसलिए यहाँ किसी भी प्रकार का विकास पर्यावरणीय संतुलन को ध्यान में रखकर होना चाहिए।

ठीक है। आगे उसी क्रम में प्रश्न–उत्तर प्रस्तुत है। यह आपके इंटरव्यू की सामग्री पर आधारित है और क्रम नहीं बदला गया है।

Rishikesh Highway Project :  Anoop Nautiyal opposes felling trees
Environmentalist Anoop Nautiyal . Photo: nautiyal’s facebook.

प्रश्न 2:

इस पूरे मामले में आंदोलन क्यों हो रहा है? आंदोलनकारियों का आरोप है कि राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) और वन विभाग बिना आवश्यक अनुमति के पेड़ काट रहे हैं। आपने इस विषय का अध्ययन किया है। वास्तविक स्थिति क्या है?

उत्तर (डॉ. वी.के. बहुगुणा):

जब यह मामला मेरे संज्ञान में आया तो मैंने सबसे पहले आंदोलन कर रहे लोगों से कहा कि मुझे न्यायालय के आदेश दिखाइए। मैंने स्वयं हाईकोर्ट के आदेशों का अध्ययन किया।

मेरे विचार से हाईकोर्ट भी यह नहीं चाहता था कि सरकार के विकास कार्यों में अनावश्यक बाधा उत्पन्न हो। मैंने 9 जनवरी 2026 के आदेश को देखा। उस आदेश में हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी।

जब याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि यह हाथियों का कॉरिडोर (Elephant Corridor) है और देश के अन्य स्थानों पर भी ऐसे कॉरिडोर संरक्षित किए गए हैं, तब हाईकोर्ट ने तमिलनाडु के मुदुमलाई (Mudumalai) अभयारण्य से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के एक निर्णय का उल्लेख किया।

हाईकोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही इस प्रकार के मामलों पर अपना दृष्टिकोण स्पष्ट कर चुका है। इसलिए इस विषय में अधिक टिप्पणी करने की आवश्यकता नहीं है।

इसके साथ ही हाईकोर्ट ने उत्तराखंड में हो रहे वनों के विनाश (Deforestation) और वन भूमि के अतिक्रमण पर भी चिंता व्यक्त की। अनीता कंडवाल की याचिका तथा उस पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा लिए गए स्वतः संज्ञान का उल्लेख करते हुए कहा गया कि उत्तराखंड सरकार को वन संरक्षण के मामले में गंभीरता दिखानी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि वन भूमि पर किसी तीसरे पक्ष के अधिकार (Third Party Rights) को मान्यता नहीं दी जाएगी।

लेकिन मेरी व्यक्तिगत राय यह है कि हाईकोर्ट का आदेश पूरी तरह स्पष्ट नहीं था। यदि हाईकोर्ट सुप्रीम कोर्ट के मुदुमलाई वाले निर्णय का उल्लेख कर रहा था, तो उसे उसी आधार पर स्पष्ट निर्देश भी देने चाहिए थे कि सड़क का अलाइनमेंट बदला जाए, पेड़ों की कटाई कम की जाए या पर्यावरणीय नुकसान कम करने के उपाय किए जाएँ।

ऐसा स्पष्ट निर्देश नहीं दिया गया। केवल यह कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट के अंतिम निर्णय की प्रतीक्षा की जाए।

बाद में 18 मार्च 2026 को जब अगली सुनवाई हुई तो पहले कुछ समय के लिए पेड़ काटने पर रोक रही। उसके बाद NHAI ने हाईकोर्ट से कहा कि 9 जनवरी वाले आदेश को स्पष्ट किया जाए, क्योंकि उसमें कोई स्पष्ट निर्देश नहीं था।

हाईकोर्ट ने बाद की सुनवाई में भी यही कहा कि उसने 9 जनवरी के आदेश में अपनी बात कह दी है। उसने नया कोई निर्देश नहीं दिया।

यही कारण है कि उसके बाद पेड़ों की कटाई फिर शुरू हो गई।

आंदोलन कर रहे लोगों का कहना था कि न्यायालय का आदेश स्पष्ट नहीं है, जबकि सरकार और NHAI का कहना था कि सड़क निर्माण का कार्य जारी रहना चाहिए।

मैंने उस समय भी श्री अनूप नौटियाल से कहा था कि यदि आदेश अस्पष्ट है तो इस मामले को बड़ी पीठ के समक्ष रखा जाए अथवा सर्वोच्च न्यायालय में जाकर स्थगन (Stay) की मांग की जाए।

बाद में मानहानि का एक मामला भी दायर किया गया, लेकिन मैंने पहले ही कहा था कि मानहानि का मामला नहीं बनता क्योंकि हाईकोर्ट ने ऐसा कोई स्पष्ट आदेश पारित नहीं किया था। अंततः वह मामला भी खारिज हो गया।

हालाँकि इस दौरान NHAI ने यह बताया कि हाथियों के आवागमन के लिए ओवरब्रिज बनाया जा रहा है, चार अंडरपास बनाए जा रहे हैं तथा कई खुले कलवर्ट भी बनाए जा रहे हैं ताकि वन्यजीवों की आवाजाही प्रभावित न हो।

संभवतः इन्हीं तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने इस परियोजना में हस्तक्षेप नहीं किया।

फिर भी मेरा स्पष्ट मत है कि यदि सड़क के अलाइनमेंट में थोड़ा भी परिवर्तन करके कुछ पेड़ों को बचाया जा सकता है, तो ऐसा अवश्य किया जाना चाहिए।

मैंने स्वयं अगरतला और असम के राष्ट्रीय राजमार्गों पर कार्य करते समय कई स्थानों पर हस्तक्षेप करके पेड़ों को बचाने का प्रयास किया था।

मेरा मानना है कि विकास होना चाहिए, लेकिन वह पूरी तरह कानून के अनुसार हो तथा पर्यावरणीय स्थिरता (Environmental Sustainability) को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।

यह पूरा क्षेत्र पहले से ही हाथियों का प्राकृतिक आवास है। कई बार हाथी भोजन और आवास के अभाव में आबादी वाले क्षेत्रों में आ चुके हैं और लोगों की मृत्यु तक हुई है।

इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए इस परियोजना की योजना बनाई जानी चाहिए थी ताकि ऐसी स्थिति उत्पन्न ही न होती कि लोगों को आंदोलन करना पड़े।

मेरे विचार से अब राज्य सरकार को आगे आकर सभी पक्षों से बातचीत करनी चाहिए।

वन मंत्री को आंदोलनकारियों, वन विभाग, NHAI और विशेषज्ञों को साथ बैठाकर विचार करना चाहिए कि क्या सड़क का अलाइनमेंट बदला जा सकता है।

यदि वास्तव में यह हाथियों के कॉरिडोर को गंभीर नुकसान पहुँचा रहा है, तो मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक (PCCF Wildlife) और अन्य विशेषज्ञों की समिति बनाकर समाधान निकाला जाना चाहिए।

मेरा उद्देश्य केवल इतना है कि विकास भी हो और पर्यावरण भी सुरक्षित रहे। जैसा कहा जाता है—साँप भी न मरे और लाठी भी न टूटे।”

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Photo : ETV Bharat

प्रश्न 3:

गढ़वाल और कुमाऊँ के लोगों को आज भी कई बार उत्तर प्रदेश होकर जाना पड़ता है। पिछले 25–30 वर्षों से मैं इस विषय पर खबरें लिखता रहा हूँ कि कोटद्वार से कालागढ़ होते हुए रामनगर तक सीधा मार्ग बनाया जाए, जिससे गढ़वाल से कुमाऊँ की पाँच–छह घंटे की यात्रा घटकर लगभग डेढ़ घंटे की रह जाए। लेकिन वह सड़क नहीं बन सकी, क्योंकि मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा और राष्ट्रीय उद्यान (नेशनल पार्क) से होकर गुजरने के कारण उस पर रोक लगी रही।

इसी प्रकार कोटद्वार से laldand-chillarkhal होते हुए ऋषिकेश जाने वाला मार्ग भी वर्षों तक बंद रहा। अब राज्य सरकार ने वहाँ सड़क निर्माण की अनुमति देने का निर्णय लिया है।

मेरा प्रश्न यह है कि पहाड़ के लोगों को हमेशा यह क्यों कहा जाता है कि जंगल बचाने के नाम पर सड़कें मत बनाओ? क्या पहाड़ के लोगों का दोष केवल इतना है कि उनका जन्म पहाड़ और जंगलों में हुआ है? दूसरी ओर शहरों में बड़े-बड़े निर्माण, कॉलोनियाँ और चौड़ी सड़कें बनती रहती हैं। इस असंतुलन को आप किस प्रकार देखते हैं?

उत्तर (डॉ. वी.के. बहुगुणा):

देखिए, आपने बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया है। इसी कारण मैंने कभी भी देहरादून–दिल्ली एक्सप्रेस-वे का विरोध नहीं किया। वह एक इकोनॉमिक कॉरिडोर है और देश के विकास के लिए आवश्यक है।

लेकिन समस्या यह है कि केवल सड़क बना देना ही पर्याप्त नहीं होता। उसकी पूरी योजना (Planning) सही होनी चाहिए।

आज स्थिति यह है कि अक्षरधाम से लोग ढाई घंटे में देहरादून पहुँच जाते हैं, लेकिन उसके बाद शहर के भीतर प्रवेश करने में दो-दो घंटे लग जाते हैं। इसका अर्थ है कि योजना अधूरी थी। आपने पेड़ भी काट दिए और ट्रैफिक की समस्या भी समाप्त नहीं हुई।

यही बात मसूरी की है। बिना दीर्घकालिक योजना के लगातार सड़कें बनाई जा रही हैं। मैंने कई बार सरकारों को लिखा है कि मसूरी की Carrying Capacity समाप्त हो चुकी है। मैं लगभग दस वर्ष पहले ही इसका अध्ययन कर चुका था।

आज स्थिति यह है कि राजपुर रोड से लेकर मसूरी तक लगातार जाम लगा रहता है। लोगों की आय बढ़ी है, पर्यटन बढ़ा है, लेकिन उसके अनुरूप प्रबंधन नहीं हुआ। इसलिए केवल सड़क बनाना समाधान नहीं है। पर्यटन को भी वैज्ञानिक ढंग से नियंत्रित करना पड़ेगा।

मैं यह नहीं कह रहा कि सड़कें नहीं बननी चाहिए। जहाँ आवश्यकता है, वहाँ अवश्य बननी चाहिए। लेकिन पहले उन गाँवों तक सड़क पहुँचाइए जहाँ आज भी बच्चे आठ-आठ किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल जाते हैं।

आज भी उत्तरकाशी, पौड़ी, टिहरी और कई अन्य क्षेत्रों में ऐसे गाँव हैं जहाँ लोग बरसात के समय पगडंडियों और अस्थायी झूलों के सहारे नदी पार करते हैं। सबसे पहले उन गाँवों को सड़क और पुलों से जोड़ना चाहिए।

इसके विपरीत यदि बिना आवश्यकता केवल चौड़ी सड़कें बनाई जाएँगी, तो उससे पर्यावरण का नुकसान होगा।

चारधाम सड़क परियोजना का उदाहरण हमारे सामने है। यदि सड़क बनानी ही थी, तो चीन और मलेशिया जैसे देशों की तकनीक अपनाई जा सकती थी। जहाँ आवश्यकता हो, वहाँ पिलरों (Viaduct) पर सड़क बनाई जा सकती थी ताकि पहाड़ कम काटने पड़ें और जंगल भी सुरक्षित रहें।

यदि पर्यावरण की अनदेखी करके विकास किया जाएगा, तो अंततः उसका आर्थिक नुकसान भी देश को ही उठाना पड़ेगा। पारिस्थितिक आपदाएँ बढ़ेंगी और भविष्य में उसका मूल्य कहीं अधिक चुकाना पड़ेगा।

जहाँ तक आपने कालाढूंगी मार्ग का प्रश्न उठाया है, मैं उस विषय से भी परिचित हूँ। जब मैं इंस्पेक्टर जनरल ऑफ फॉरेस्ट था, तब भी यह विषय विचाराधीन था। उस समय केंद्र और राज्य सरकारों ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि वहाँ पहले से वन मार्ग मौजूद है और उसे विकसित करने की अनुमति दी जानी चाहिए।

यदि अब उस मार्ग को अनुमति मिल रही है, तो यह अच्छा कदम है। लेकिन फिर भी मैं यही कहूँगा कि हर सड़क का निर्माण वैज्ञानिक अध्ययन और पर्यावरणीय मूल्यांकन के बाद ही होना चाहिए।

यदि कुछ दूरी उत्तर प्रदेश से होकर जाना पड़ता है, तो वह भी देश का ही हिस्सा है। केवल कुछ किलोमीटर कम करने के लिए ऐसे निर्णय नहीं लेने चाहिए जिनसे जंगलों और वन्यजीवों को अपूरणीय क्षति पहुँचे।

मैं हमेशा विकास का समर्थक रहा हूँ, लेकिन अनावश्यक सड़क निर्माण का समर्थक कभी नहीं रहा।

जो सड़क वास्तव में आवश्यक है, वह अवश्य बने। लेकिन बिना योजना के, केवल दूरी कम करने के लिए यदि हजारों पेड़ काटे जाएँ, तो वह उचित नहीं है। विकास और पर्यावरण—दोनों के बीच संतुलन बनाना ही सबसे बड़ा समाधान है।

बिल्कुल। आगे उसी क्रम में प्रश्न–उत्तर प्रस्तुत है। मैंने मूल बातचीत की भावना और क्रम को बनाए रखा है।


प्रश्न 4:

जब देहरादून एक्सप्रेस-वे बना तो हाथियों के लिए एलिफेंट कॉरिडोर भी बनाया गया। अक्षरधाम से देहरादून तक अब लोग लगभग ढाई घंटे में पहुँच जाते हैं। लेकिन उसके बाद देहरादून शहर में प्रवेश करते ही लंबा जाम लग जाता है। ठीक यही स्थिति ऋषिकेश वाले नए हाईवे की भी होगी। ऋषिकेश से तो लोग जल्दी देहरादून पहुँच जाएंगे, लेकिन उसके बाद शहर में वही बोतलनेक (Bottle Neck) बन जाएगा। क्या यह सही योजना है?

उत्तर (डॉ. वी.के. बहुगुणा):

बिल्कुल, मैं भी यही बात कह रहा हूँ। यही हमारी सबसे बड़ी समस्या है।

हमारे यहाँ सड़क निर्माण की योजना केवल सड़क तक सीमित रहती है। यह नहीं सोचा जाता कि सड़क जिस शहर तक पहुँच रही है, उस शहर की क्षमता (Capacity) क्या है और वह अतिरिक्त यातायात को संभाल भी पाएगा या नहीं।

आज देहरादून की स्थिति देख लीजिए। हर व्यक्ति वहीं बसना चाहता है। लगातार निर्माण हो रहा है। शहर की प्राकृतिक जल निकासी (Drainage System) तक प्रभावित हो चुकी है।

आप मुंबई का उदाहरण देखिए। कुछ दिनों पहले वहाँ भारी जलभराव हुआ। उसका सबसे बड़ा कारण यही था कि बड़े-बड़े निर्माणों ने प्राकृतिक नालों और ड्रेनेज को अवरुद्ध कर दिया। यदि शहर की प्राकृतिक व्यवस्था से छेड़छाड़ होगी तो परिणाम भी भुगतने पड़ेंगे।

देहरादून और ऋषिकेश में भी यही स्थिति बन रही है।

जहाँ प्रभावशाली लोग होते हैं, वे सार्वजनिक भूमि पर अतिक्रमण कर लेते हैं। वन भूमि पर भी कब्जे होते हैं। यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट को उत्तराखंड में वन भूमि पर हो रहे अतिक्रमण पर स्वतः संज्ञान लेना पड़ा।

मैं स्वयं कई बार इस विषय पर लिख चुका हूँ कि वन क्षेत्रों में बड़ी संख्या में धार्मिक संरचनाएँ (Religious Structures) बना दी गई हैं।

सरकारी आँकड़ों के अनुसार लगभग 600 धार्मिक संरचनाएँ वन भूमि पर चिन्हित हुई थीं। इनमें लगभग 435 मज़ारें थीं और शेष अन्य धार्मिक स्थल थे। केवल मज़ारों की संख्या ही लगभग 300 के आसपास थी।

मैंने इस विषय में प्रधानमंत्री को भी पत्र लिखा था। उसके बाद मुख्यमंत्री ने कार्रवाई प्रारम्भ की। लेकिन आज भी मैं यह कहूँगा कि जिन अधिकारियों की लापरवाही से यह सब हुआ, उनकी जवाबदेही (Accountability) तय नहीं की गई।

सबसे पहला काम वनों की सुरक्षा होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट भी बार-बार यही कहता रहा है कि पहले वन भूमि की रक्षा कीजिए।

मेरे विचार से राज्य सरकार को पिछले 20 वर्षों का पूरा रिकॉर्ड देखना चाहिए कि वन भूमि और राजस्व भूमि के नक्शों में कहीं कोई बदलाव तो नहीं किया गया। कहीं सर्वे के नाम पर वन भूमि को दूसरी श्रेणी में तो नहीं दिखाया गया।

मैं स्वयं कई स्थानों पर देखता हूँ कि बड़ी-बड़ी कॉलोनियाँ बस गई हैं। वहाँ 70–80 वर्ष पुराने साल के पेड़ खड़े हैं। अब प्रश्न उठता है कि यदि वहाँ इतने पुराने पेड़ हैं तो वह भूमि पहले किसकी थी? क्या वह वास्तव में वन भूमि थी? यदि थी, तो वहाँ कॉलोनी कैसे बस गई?

इन सभी मामलों की निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए।

जहाँ तक हाईवे की बात है, मैं यह नहीं कहता कि हाईवे बनाना गलत है। मुंबई–पुणे एक्सप्रेस-वे का उदाहरण हमारे सामने है। जब श्री नितिन गडकरी महाराष्ट्र में लोक निर्माण मंत्री थे, तब भी हजारों पेड़ों का प्रश्न उठा था।

लेकिन केवल यह मत गिनिए कि कितने पेड़ कटे। यह भी देखिए कि कितने पेड़ काटना वास्तव में अनिवार्य था, क्या उनका कोई विकल्प था, और पर्यावरणीय क्षति की भरपाई (Mitigation) के लिए क्या व्यवस्था की गई।

देश को विकास करना ही होगा। सड़कें भी बनेंगी।

लेकिन यदि विकास पर्यावरण को पूरी तरह नज़रअंदाज़ करके किया जाएगा, तो भविष्य में पूरा देश उसकी कीमत चुकाएगा।

भारत एक उष्णकटिबंधीय (Tropical) देश है। यहाँ हर वर्ष बाढ़, भूस्खलन और अन्य प्राकृतिक आपदाएँ बढ़ रही हैं। इसलिए सड़क निर्माण के साथ-साथ जल संरक्षण, पहाड़ों की स्थिरता और जंगलों की रक्षा पर भी समान रूप से ध्यान देना होगा।

मैं जब अपने गाँव जाता हूँ तो टिहरी, श्रीनगर और रानीपोखरी की कई सड़कों की स्थिति देखता हूँ। कई स्थानों पर सड़क का अलाइनमेंट ही ठीक नहीं बनाया गया। चारधाम ऑल वेदर रोड परियोजना पर भी अनेक प्रश्न उठे हैं।

यदि कोई भी परियोजना वैज्ञानिक योजना, पर्यावरणीय अध्ययन और भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर बनेगी, तभी जनता का उस पर विश्वास बनेगा।

इसी विश्वास की कमी के कारण आज लोग ऋषिकेश के जंगलों में पेड़ों की कटाई का विरोध कर रहे हैं।

https://www.etvbharat.com/en/bharat/concerned-citizens-oppose-bhaniawala-rishikesh-road-widening-project-where-thousands-of-trees-will-be-axed-enn26070903497

प्रश्न 5:

मैंने एक बात नोटिस की है। मोदी सरकार के आने से पहले सुप्रीम कोर्ट पर्यावरण और वन मामलों में काफी सख्ती दिखाता था। राजाजी नेशनल पार्क और उसके आसपास के गाँवों में सड़कें वर्षों तक नहीं बन पाईं। लेकिन अब ऐसा लगता है कि यदि सरकार कोई निर्णय लेती है, तो सुप्रीम कोर्ट भी पहले की तुलना में कम हस्तक्षेप करता है। क्या आपको भी ऐसा बदलाव दिखाई देता है? क्या विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता है?

उत्तर (डॉ. वी.के. बहुगुणा):

देखिए, आपने जो बात कही, उसमें कुछ हद तक लोगों की ऐसी धारणा जरूर बनी है, लेकिन मैं यह नहीं मानता कि सुप्रीम कोर्ट अपनी स्वतंत्रता से समझौता करता है।

मोदी सरकार के भी अनेक निर्णय ऐसे रहे हैं, जिन पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाए हैं और कई मामलों में सरकार के फैसलों को चुनौती भी दी गई है। इसलिए यह कहना कि सुप्रीम कोर्ट केवल सरकार की बात मान लेता है, पूरी तरह सही नहीं होगा।

हाँ, एक समस्या जरूर पैदा हुई है। पिछले कुछ वर्षों में बड़ी संख्या में ऐसे लोग और ऐसे गैर-सरकारी संगठन (NGO) सामने आए हैं, जो सरकार के लगभग हर निर्णय के खिलाफ सीधे जनहित याचिका (PIL) लेकर सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट पहुँच जाते हैं।

इनमें से बहुत-सी याचिकाएँ बाद में निराधार या कमजोर साबित होती हैं। अदालतें भी बार-बार ऐसी याचिकाएँ सुनते-सुनते थक जाती हैं। इसका नुकसान यह होता है कि जब वास्तव में कोई गंभीर और महत्वपूर्ण पर्यावरणीय मामला सामने आता है, तब भी न्यायालय पहले जैसी तत्परता से हस्तक्षेप नहीं कर पाता।

मैं अक्सर कहता हूँ कि एक मछली पूरे तालाब को गंदा कर देती है।

पहले एक समय ऐसा था जब जनहित याचिकाओं को बहुत सकारात्मक दृष्टि से देखा जाता था। अदालतें पर्यावरण संरक्षण के मामलों में सक्रिय रहती थीं। लेकिन बाद में जब बड़ी संख्या में फर्जी, राजनीतिक या निजी हितों से प्रेरित याचिकाएँ आने लगीं, तो न्यायपालिका का दृष्टिकोण भी स्वाभाविक रूप से अधिक सतर्क हो गया।

इसी कारण कभी-कभी वास्तविक और गंभीर पर्यावरणीय मुद्दों पर भी अपेक्षित गति से निर्णय नहीं हो पाते।

मेरे विचार से सुप्रीम कोर्ट आज भी पूरी तरह स्वतंत्र है और भविष्य में भी रहेगा।

लेकिन विशेष रूप से वन एवं पर्यावरण से जुड़े मामलों की सुनवाई करने वाली फॉरेस्ट बेंच को यह लगातार देखना चाहिए कि उसके पहले दिए गए आदेशों का पालन वास्तव में हो भी रहा है या नहीं।

मैं आपको एक उदाहरण देता हूँ।

Forest Rights Act को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने Forest Survey of India को निर्देश दिया था कि वह पूरे देश में इसका वैज्ञानिक मूल्यांकन करे। लेकिन आज स्थिति यह है कि कई स्थानों पर इस कानून का उपयोग वास्तविक वनवासियों के अधिकारों की रक्षा से अधिक वन भूमि पर कब्जे और अतिक्रमण के साधन के रूप में होने लगा है।

इस कानून का उद्देश्य ऐतिहासिक अन्याय (Historical Injustice) को दूर करना था। लेकिन आज भी वर्षों बाद यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि वास्तविक लाभार्थी कौन हैं और किसे अधिकार मिलना चाहिए।

इसी कारण मेरा व्यक्तिगत मत है कि केंद्र सरकार को इस पूरे कानून की व्यापक समीक्षा करनी चाहिए और जहाँ आवश्यक हो, वहाँ सुधार करने चाहिए।

मैं स्वयं प्रधानमंत्री से भी आग्रह करूँगा कि इस विषय पर गंभीरता से विचार किया जाए, क्योंकि पर्यावरण संरक्षण केवल कानून बनाने से नहीं होगा, बल्कि उनके सही क्रियान्वयन से होगा।

सरकार को पर्यावरण संरक्षण के प्रति और अधिक स्पष्ट प्रतिबद्धता (Commitment) दिखानी होगी।

यदि हम इतिहास देखें तो श्रीमती इंदिरा गांधी के समय पर्यावरण संरक्षण को राष्ट्रीय नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया था। उसके बाद 1996 में सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध गोदावरमन (Godavarman) मामले के बाद वन संरक्षण के क्षेत्र में कई ऐतिहासिक निर्णय हुए।

लेकिन आज भी स्थिति यह है कि सुप्रीम कोर्ट के अनेक आदेश राज्यों में पूरी तरह लागू नहीं किए गए हैं।

माइनिंग (खनन) से जुड़े मामलों में भी कई महत्वपूर्ण आदेश आज तक अधूरे पड़े हैं।

मेरे विचार से फॉरेस्ट बेंच को केवल नए मामलों की सुनवाई ही नहीं करनी चाहिए, बल्कि यह भी देखना चाहिए कि पहले दिए गए आदेशों का पालन किस स्तर तक हुआ है।

प्रश्न 6:

अंत में आप सरकार, वन विभाग और आम जनता को क्या संदेश देना चाहेंगे?

उत्तर (डॉ. वी.के. बहुगुणा):

मैं केवल इतना कहना चाहूँगा कि इस पूरे मामले की एक बार पुनः समीक्षा (Review) की जानी चाहिए।

वन विभाग को सड़क के अलाइनमेंट का फिर से अध्ययन करना चाहिए।

जहाँ तक संभव हो, पेड़ों को बचाने का प्रयास किया जाए।

मेरी समझ से कुछ सौ मीटर तक यदि सड़क को थोड़ा बदला जाए, तो बड़ी संख्या में पेड़ों को बचाया जा सकता है।

पूरा जंगल काटकर फोरलेन बनाने की आवश्यकता मुझे नहीं लगती, क्योंकि कुछ ही दूरी बाद सड़क सीधी हो जाती है और फिर दो-तीन किलोमीटर के भीतर ऋषिकेश आ जाता है।

यदि थोड़ी वैज्ञानिक योजना बनाई जाए तो विकास भी होगा और जंगल भी बचेंगे।

मेरा हमेशा से यही मानना रहा है कि देश का विकास अवश्य होना चाहिए, लेकिन पर्यावरण की कीमत पर नहीं।

सरकार, वन विभाग, विशेषज्ञ, स्थानीय लोग और पर्यावरणविद्—सभी को साथ बैठकर ऐसा समाधान निकालना चाहिए जिससे आने वाली पीढ़ियों के लिए जंगल भी सुरक्षित रहें और जनता को बेहतर सड़कें भी मिलें।

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