NBA National Biodiversity Authority भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल है जहाँ जैव विविधता (Biodiversity) अत्यंत समृद्ध है। हिमालय से लेकर पश्चिमी घाट, सुंदरबन के मैंग्रोव से लेकर थार के रेगिस्तान तक देश के विभिन्न हिस्सों में हजारों प्रकार की वनस्पतियाँ, जीव-जंतु और पारिस्थितिक तंत्र मौजूद हैं। लेकिन बीते कुछ दशकों में प्राकृतिक आवासों के विनाश, जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, अवैध शिकार और जैविक संसाधनों के अत्यधिक दोहन के कारण अनेक प्रजातियाँ विलुप्त होने के कगार पर पहुँच गई हैं।
इसी चुनौती से निपटने के लिए राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (National Biodiversity Authority-NBA) ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए संकटग्रस्त प्रजातियों की वैज्ञानिक पहचान और अधिसूचना हेतु मानक संचालन प्रक्रिया (Standard Operating Procedure-SOP) जारी की है। यह पहल देश में जैव विविधता संरक्षण को अधिक वैज्ञानिक, पारदर्शी और प्रभावी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
https://www.pib.gov.in/PressReleaseDetail.aspx?PRID=2278284®=48&lang=2
NBA : नई SOP क्यों जरूरी थी?
अब तक विभिन्न राज्यों में संकटग्रस्त प्रजातियों की पहचान के लिए अलग-अलग तरीके अपनाए जाते थे। इससे वैज्ञानिक मानकों में एकरूपता का अभाव था और कई बार संरक्षण संबंधी निर्णयों में देरी भी होती थी।
नई एसओपी इन समस्याओं का समाधान करती है। इसके माध्यम से पूरे देश में एक समान प्रक्रिया अपनाई जाएगी ताकि किसी भी प्रजाति के संरक्षण का निर्णय वैज्ञानिक तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर लिया जा सके।
NBA : नई SOP क्यों जरूरी थी?
जैव विविधता अधिनियम, 2002 की धारा 38 क्या कहती है?
जैव विविधता अधिनियम, 2002 की धारा 38 केंद्र सरकार को यह अधिकार देती है कि वह किसी राज्य सरकार से परामर्श कर ऐसी प्रजातियों को “संकटग्रस्त प्रजाति” (Endangered Species) घोषित कर सके जो निकट भविष्य में विलुप्त होने की आशंका रखती हों।
एक बार किसी प्रजाति को संकटग्रस्त घोषित किए जाने के बाद—
- उसके संग्रहण और उपयोग पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है।
- उसके संरक्षण और पुनर्वास की योजना तैयार की जाती है।
- अवैध दोहन रोकने के लिए कानूनी प्रावधान लागू होते हैं।
- संबंधित जैविक संसाधनों के उपयोग पर विशेष निगरानी रखी जाती है।
अब तक कितनी प्रजातियों को घोषित किया गया है?
पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अनुसार अब तक—
- 17 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों से संबंधित
- 159 पौधों की प्रजातियों
- तथा 173 पशु प्रजातियों
को संकटग्रस्त घोषित किया जा चुका है।
नई एसओपी के बाद यह प्रक्रिया और अधिक व्यवस्थित तथा तेज होने की उम्मीद है।
एसओपी में क्या-क्या शामिल है?
राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण द्वारा जारी मानक संचालन प्रक्रिया कई चरणों में काम करेगी।
1. वैज्ञानिक पहचान
सबसे पहले उन प्रजातियों की पहचान की जाएगी जिनकी आबादी तेजी से घट रही है या जिनके विलुप्त होने की संभावना बढ़ रही है।
2. क्षेत्रीय सर्वेक्षण
वैज्ञानिक, वन विभाग, भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण (BSI), भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (ZSI) और अन्य विशेषज्ञ क्षेत्र में जाकर वास्तविक स्थिति का अध्ययन करेंगे।
3. हितधारकों से परामर्श
स्थानीय समुदायों, ग्राम सभाओं, जैव विविधता प्रबंधन समितियों, विश्वविद्यालयों और विषय विशेषज्ञों की राय ली जाएगी।
4. वैज्ञानिक सत्यापन
सभी प्राप्त आंकड़ों का वैज्ञानिक मूल्यांकन किया जाएगा ताकि किसी भी प्रजाति को बिना पर्याप्त प्रमाण के संकटग्रस्त घोषित न किया जाए।
5. अधिसूचना
सभी औपचारिक प्रक्रियाएँ पूरी होने के बाद संबंधित राज्य सरकार केंद्र को अनुशंसा भेजेगी और अधिसूचना जारी होगी।
6. संरक्षण कार्य योजना
अधिसूचना के बाद केवल घोषणा ही नहीं होगी बल्कि संबंधित प्रजाति के संरक्षण, पुनर्वास और संख्या बढ़ाने के लिए विस्तृत कार्ययोजना भी तैयार की जाएगी।
7. निगरानी एवं समीक्षा
समय-समय पर प्रजातियों की स्थिति की समीक्षा की जाएगी और यदि नए खतरे सामने आते हैं तो रणनीति में बदलाव भी किया जाएगा।

वैज्ञानिक प्रमाणों पर होगा जोर
नई एसओपी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें केवल अनुमान या पारंपरिक जानकारी के आधार पर निर्णय नहीं लिए जाएंगे।
इसमें प्राथमिकता दी जाएगी—
- वैज्ञानिक अनुसंधान
- फील्ड सर्वे
- जैविक आंकड़ों
- पारंपरिक स्थानीय ज्ञान
- विशेषज्ञों की रिपोर्ट
- आधुनिक संरक्षण तकनीकों
को।
इससे निर्णय अधिक विश्वसनीय और प्रभावी बनेंगे।
स्थानीय समुदायों की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत के अनेक जंगलों और जैव विविधता वाले क्षेत्रों में रहने वाले स्थानीय एवं आदिवासी समुदाय सदियों से प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करते आए हैं।
नई एसओपी में इन्हें भी महत्वपूर्ण भागीदार बनाया गया है।
इनकी सहभागिता से—
- दुर्लभ प्रजातियों की सही जानकारी मिलेगी।
- संरक्षण योजनाएँ व्यवहारिक बनेंगी।
- स्थानीय लोगों की आजीविका और संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित होगा।
2025 के नए जैव विविधता विनियमों से क्या संबंध है?
हाल ही में लागू जैविक विविधता (जैविक संसाधनों और उनसे संबंधित ज्ञान तक पहुंच और लाभों का निष्पक्ष एवं समान बंटवारा) विनियम, 2025 के बाद यह एसओपी और भी महत्वपूर्ण हो गई है।
यदि कोई प्रजाति संकटग्रस्त घोषित होती है तो उससे जुड़े जैविक संसाधनों के उपयोग, अनुसंधान और व्यावसायिक गतिविधियों में लाभ-साझाकरण (Benefit Sharing) के अलग प्रावधान लागू होंगे।
इससे जैविक संसाधनों के व्यावसायिक उपयोग में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ेगी।
भारत के लिए यह कदम क्यों महत्वपूर्ण है?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते संकटग्रस्त प्रजातियों की पहचान नहीं की गई तो कई दुर्लभ जीव-जंतु और पौधे हमेशा के लिए समाप्त हो सकते हैं।
नई एसओपी के लागू होने से—
- विलुप्ति के खतरे की समय रहते पहचान होगी।
- राज्यों में एक समान वैज्ञानिक प्रणाली लागू होगी।
- संरक्षण योजनाओं की गुणवत्ता बढ़ेगी।
- जैव विविधता पर आधारित आजीविका सुरक्षित होगी।
- जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने में मदद मिलेगी।
- पारिस्थितिक संतुलन मजबूत होगा।
राष्ट्रीय जैव विविधता रणनीति 2024-2030 को मिलेगा बल
यह पहल राष्ट्रीय जैव विविधता रणनीति एवं कार्य योजना (2024-2030) के लक्ष्य-4 को मजबूत करेगी।
इस लक्ष्य का उद्देश्य है—
- मानवजनित विलुप्ति को रोकना
- संकटग्रस्त प्रजातियों का पुनरुद्धार
- आनुवंशिक विविधता का संरक्षण
- प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत बनाना
साथ ही यह कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता ढाँचे (Kunming-Montreal Global Biodiversity Framework) के अंतरराष्ट्रीय लक्ष्यों को पूरा करने में भी भारत की मदद करेगा।
विशेषज्ञों की राय
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश भी आवश्यक होते हैं। नई एसओपी राज्यों, वैज्ञानिक संस्थानों और स्थानीय समुदायों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने का अवसर प्रदान करती है। यदि इसका ईमानदारी से पालन किया गया तो यह भारत की जैव विविधता संरक्षण प्रणाली को अधिक सशक्त बना सकती है।
निष्कर्ष
राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण द्वारा जारी यह नई एसओपी केवल एक प्रशासनिक दस्तावेज नहीं, बल्कि भारत की प्राकृतिक धरोहर को सुरक्षित रखने की दिशा में एक दूरदर्शी पहल है। यह राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को संकटग्रस्त प्रजातियों की पहचान, वैज्ञानिक मूल्यांकन, अधिसूचना और संरक्षण के लिए स्पष्ट मार्गदर्शन प्रदान करती है।
बढ़ते पर्यावरणीय संकट और जलवायु परिवर्तन के दौर में ऐसी वैज्ञानिक एवं पारदर्शी प्रक्रियाएँ भविष्य की पीढ़ियों के लिए देश की जैव विविधता को सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँगी। यदि राज्यों, वैज्ञानिक संस्थानों, स्थानीय समुदायों और नीति-निर्माताओं के बीच प्रभावी समन्वय स्थापित होता है, तो भारत न केवल अपनी दुर्लभ प्रजातियों को विलुप्त होने से बचा सकेगा, बल्कि वैश्विक जैव विविधता संरक्षण में भी अग्रणी भूमिका निभा सकेगा।